कामदा एकादशी व्रत सर्व पाप विमोचिनी है

कामदा एकादशी व्रत सर्व पाप विमोचिनी है। यह व्रत 27 मार्च 2018 दिन मंगलवार को है। कामदा एकादशी व्रत चैत्र शुक्ल पक्ष की एकादशी को मनाया जाता है। इस व्रत में भगवान श्री विष्णु की पूजा अर्चना की जाती है। इस व्रत को विष्णु भगवान् का उत्तम व्रत कहा गया है। यह एकादशी व्रत सभी प्रकार के कष्टों का निवारण करने वाली और मनोवांछित फल प्रदान करने वाली होने के कारण ही कामदा कही जाती है। इसका शाब्दिक अर्थ भी है काम और दा अर्थात सभी प्रकार के कामनाओ को पूर्ण करने वाला व्रत।मंगलवार

 

कामदा एकादशी व्रत से लाभ(Benefit from Kamdaa Ekadashi Vrat)

कहा जाता है की कामदा एकादशी व्रत करने से सभी प्रकार के पापों से शीघ्र ही मुक्ति मिल जाती है। भारतीय हिन्दु धर्म में किसी ब्राह्मण की हत्या करना सबसे भयंकर पाप के रूप में माना जाता है। कामदा एकादशी उपवास करने से ब्राह्मण की हत्या जैसे पाप से मुक्ति मिल जाती है।

कामदा एकादशी व्रत सर्व पाप विमोचिनी है

एकादशी व्रत का पारण कब करें और कब नहीं करें

एकादशी व्रत के दूसरे दिन सूर्योदय के बाद पारण किया जाता है। पारण का अर्थ होता है उपवास समाप्त कर अन्न ग्रहण करना। एकादशी व्रत का पारण द्वादशी तिथि समाप्त होने से पहले अवश्य ही कर लेना चाहिए यदि ऐसा नहीं करते है तो व्रत का पूरा फल नहीं मिल पाता है। यदि द्वादशी तिथि सूर्योदय से पहले समाप्त हो गयी हो तो एकादशी व्रत का पारण सूर्योदय के बाद ही कर लेना चाहिए। द्वादशी तिथि के भीतर यदि पारण नहीं करते है तो पाप करने के समान होता है।

एकादशी व्रत का पारण हरि वासर के दौरान कभी भी नहीं करना चाहिए। जो भक्त व्रत कर रहे हैं उन्हें व्रत समाप्त करने से पूर्व हरि वासर समाप्त होने की प्रतिक्षा अवश्य ही करनी चाहिए अन्यथा व्रत का पूर्ण फल नहीं मिलेगा। “हरि वासर” कब होता है ? द्वादशी तिथि की प्रथम एक चौथाई अवधि को हरि वासर कहा जाता है। व्रत समाप्त करने के लिए सबसे उपयुक्त समय प्रातःकाल होता है। व्रत करने वाले भक्तो को दोपहर के समय व्रत तोड़ने से बचना चाहिए। कभी कभी किसी कारण से से अगर कोई प्रातःकाल पारण कर पाता है तो उसे दोपहर के बाद ही पारण करना चाहिए।

कामदा एकादशी व्रत विधि |Method of Kamdaa Ekadashi Vrat 

कामदा एकादशी के दिन सर्वप्रथम स्नान आादि से पवित्र होने के बाद संकल्प करके भगवान श्री विष्णु का पूजन करना चाहिए। विष्णु भगवान को फूल, फल, तिल, दूध, पंचामृत आदि पदार्थ अर्पित करना चाहिए। पुरे दिन बिना पानी पिए ( निर्जल) विष्णु जी के नाम का जप एवं कीर्तन करते हुए यह व्रत पूरा करना चाहिए। एकादशी व्रत में ब्राह्मण भोजन एवं दक्षिणा का बहुत ही महत्व है अत: द्वादशी के दिन ब्राह्मण भोज कराना चाहिए उसके बाद दक्षिणा सहित ब्राह्मण को विदा करना चाहिए। पुनः उसके बाद स्वयं पारण करना चाहिए। इस प्रकार से जो व्यक्ति चैत्र शुक्ल पक्ष में कामदा एकादशी का व्रत रखता है उसकी सभी प्रकार की इच्छाओं की पूर्ति विष्णु कृपा से शीघ्र ही पूर्ण होती है।

कामदा एकादशी व्रत कथा (Story of Kamdaa Ekadashi Vrat)

कामदा एकादशी व्रत के महत्त्व के सम्बन्ध में सर्वप्रथम राजा दिलीप को वशिष्ठ मुनि ने बताया था। भगवान श्रीकृष्ण ने पाण्डु पुत्र धर्मराज युधिष्ठिर को बताया था। आइये जानते है क्या है कथा —

धर्मराज युधिष्ठिर कहते है कि हे भगवन् ! मैं आपको कोटि-कोटि नमस्कार करता हूँ। अब आप कृपा करके चैत्र शुक्ल एकादशी का क्या महत्त्व है बताए। भगवान श्रीकृष्ण कहने लगे कि हे धर्मराज! यही प्रश्न एक समय राजा दिलीप ने गुरु वशिष्ठजी से किया था और जो समाधान उन्होंने किया वो सब मैं आपको बताता हूँ।

प्राचीनकाल में भोगीपुर नामक एक नगर था। वहाँ पर अनेक ऐश्वर्यों से युक्त पुण्डरीक नाम का एक राजा राज्य करता था। भोगीपुर नगर में अनेक अप्सरा, किन्नर तथा गन्धर्व निवास करते थे। उनमें से एक जगह ललित और ललिता नाम के पुरुष- स्त्री सुन्दर घर में निवास करते थे। उन दोनों में बहुत प्रेम था। जब कभी दोनों एक दूसरे से अलग हो जाते थे तो दोनों एक दूसरे के लिए व्याकुल हो जाते थे।

 एक समय पुण्डरीक की सभा में अन्य गंधर्वों सहित ललित भी गान कर रहा था। गाते-गाते उसे अपनी प्रिय ललिता का स्मरण हो गया और उसका स्वर भंग होने के कारण गाने का स्वरूप बिगड़ गया। ललित के मन के भाव जानकर कार्कोट नामक नाग ने पद भंग होने का कारण राजा से कह दिया। तब पुण्डरीक ने क्रोधपूर्वक कहा कि तू मेरे सामने गाता हुआ अपनी स्त्री का स्मरण कर रहा है। अत: तू कच्चा माँस और मनुष्यों को खाने वाला राक्षस बनकर अपने किए कर्म का फल भोगेगा।

पुण्डरीक के श्राप से ललित उसी क्षण राक्षस बन गया। उसका मुख अत्यंत भयंकर, नेत्र सूर्य-चंद्रमा की तरह प्रदीप्त तथा मुख से अग्नि निकलने लगी। उसकी नाक पर्वत की कंदरा के समान विशाल हो गई और गर्दन पर्वत के समान लगने लगी। सिर के बाल पर्वतों पर खड़े वृक्षों के समान लगने लगे तथा भुजाएँ अत्यंत लंबी हो गईं। कुल मिलाकर उसका शरीर आठ योजन के विस्तार में हो गया।

इस प्रकार राक्षस होकर वह अनेक प्रकार के दुःख भोगने लगा। जब उसकी प्रियतमा ललिता को यह घटना मालूम हुआ तो उसे अत्यंत दुःख हुआ और वह अपने पति के उद्धार के लिए सोचने लगी। वह राक्षस अनेक प्रकार के दुःख सहता हुआ घने वनों में रहने लगा। उसकी स्त्री उसके पीछे-पीछे जाती और विलाप करती रहती। एक बार ललिता अपने पति के पीछे घूमती-घूमती विन्ध्याचल पर्वत पर पहुँच गई, जहाँ पर श्रृंगी ऋषि का आश्रम था। ललिता शीघ्र ही श्रृंगी ऋषि के आश्रम में गई और वहाँ जाकर विनीत भाव से प्रार्थना करने लगी।

उसे देखकर श्रृंगी ऋषि बोले – कि हे सुभगे! तुम कौन हो और यहाँ किस लिए आई हो? ‍ललिता बोली कि हे मुने! मेरा नाम ललिता है। मेरा पति राजा पुण्डरीक के श्राप से राक्षस हो गया है। इसी शोक से मैं संतप्त हु। उसके उद्धार का कोई उपाय बतलाइए। श्रृंगी ऋषि बोले हे गंधर्व कन्या ! अब चैत्र शुक्ल एकादशी आने वाली है, जिसका नाम कामदा एकादशी है। इसका व्रत करने से मनुष्य के सभी कामनाओ की पूर्ति होती है। यदि तू कामदा एकादशी का व्रत कर उसके पुण्य का फल अपने पति को दे तो वह शीघ्र ही राक्षस योनि से मुक्त हो जाएगा और राजा का श्राप भी अवश्य ही शांत हो जाएगा।

मुनि के मुख्य से ऐसे वचन सुनकर ललिता ने चैत्र शुक्ल एकादशी आने पर उसका व्रत किया और द्वादशी को ब्राह्मणों के सामने अपने व्रत का फल अपने पति को देती हुई भगवान से इस प्रकार प्रार्थना करने लगी – हे प्रभो! मैंने जो यह व्रत किया है इसका फल मेरे पतिदेव को प्राप्त हो जाए जिससे वह राक्षस योनि से मुक्त हो जाए। एकादशी का फल देते ही उसका पति राक्षस योनि से मुक्त होकर अपने पुराने स्वरूप में आ गया। फिर अनेक सुंदर वस्त्राभूषणों से युक्त होकर ललिता के साथ विहार करने लगा। उसके पश्चात वे दोनों विमान में बैठकर स्वर्गलोक चले गए।

वशिष्ठ मुनि कहने लगे कि हे राजन्! इस व्रत को विधिपूर्वक करने से समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं तथा राक्षस आदि की योनि भी छूट जाती है। संसार में इसके समान अन्य कोई और दूसरा व्रत नहीं है। इसकी कथा पढ़ने या सुनने से वाजपेय यज्ञ का फल प्राप्त होता है।

वर्तमान समय में राक्षस का अर्थ है जातक अंतःकरण में रहने वाले तामसिक गुण। इस समय यह व्रत करने से सभी प्रकार के तामसिक प्रवृत्तियों का नाश हो जाता है तथा अंतःकरण में सात्विक वृत्तियों का संचार होने लगता है।

 
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About Dr. Deepak Sharma
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2 thoughts on “कामदा एकादशी व्रत सर्व पाप विमोचिनी है

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