नवरात्रि में माँ दुर्गा के नौ रूपों की पूजा कैसे करें

नवरात्रि में माँ दुर्गा के नौ रूपों की पूजा कैसे करें(How to worship the nine form of Ma Durga in Navratri) यह जानना अत्यंत महत्वपूर्ण है। नवरात्रि में माँ दुर्गा अपने प्रथम स्वरूप में शैलपुत्री के रूप में प्रतिष्ठित है। शैल शब्द का शाब्दिक अर्थ होता है पर्वत। पर्वतराज हिमालय के यहां जन्म लेने से, माँ शैलपुत्री के रूप में विश्व प्रसिद्ध है। प्रथम स्वरूप में माता अपने वृषभ रुपी वाहन पर विराजमान होती है, उनके दाहिने हाथ में त्रिशूल और बाएं हाथ में कमल का पुष्प होता है। माँ दुर्गा के इसी स्वरूप का पूजन नवरात्रि के प्रथम दिन में किया जाता है।

 

नवरात्रि में माँ दुर्गा के नौ रूपों की पूजा कैसे करें

नवरात्रि में माँ शैलपुत्री की पूजा कैसे करें

नवरात्रि में माँ शैलपुत्री की पूजा के लिए प्रातःकाल नित्य क्रिया से निवृत्य होकर अपने घर में ही मंदिर के पास अथवा घर के अंदर जो पवित्र स्थान हो वहां पर मिट्टी से वेदी बनाकर उसमें जौ, गेहूं बोएं और उस पर कलश स्थापित करें। कलश पर माँ शैलपुत्री की मूर्ति स्थापित करें। कलश के पीछे स्वास्तिक और त्रिशूल बनाएं। इसके उपरांत माता का ध्यान, स्त्रोत का जप तथा कवच पाठ करना चाहिए। एतदर्थ अधोलिखित शलोको का पाठ शुद्ध तन तथा मन से करना चाहिए।

ध्यान हेतू श्लोक

वंदे वांच्छित लाभायाचंद्रार्धकृतशेखराम्।

वृषारूढां शूलधरां शैलपुत्री यशस्विनीम्॥मूलाधार स्थितांप्रथम दुर्गा त्रिनेत्रा।

पूर्णेन्दुनिभांगौरी पटांबरपरिधानांरत्नकिरीटांनानालंकारभूषिता॥

प्रफुल्ल वदनांपल्लवाधरांकांतकपोलांतुंग कुचाम्।

कमनीयांलावण्यांस्मेरमुखीक्षीणमध्यांनितंबनीम्॥

स्तोत्र पाठ हेतू श्लोक

प्रथम दुर्गा त्वहिभवसागर तारणीम्।

धन ऐश्वर्य दायिनी शैलपुत्रीप्रणमाभ्यहम्॥

त्रिलोकजननींत्वंहिपरमानंद प्रदीयनाम्।

सौभाग्यारोग्यदायनीशैलपुत्रीप्रणमाभ्यहम्॥

चराचरेश्वरीत्वंहिमहामोह विनाशिन।

भुक्ति, मुक्ति दायनी,शैलपुत्रीप्रणमाभ्यहम्॥

चराचरेश्वरीत्वंहिमहामोह विनाशिन।

भुक्ति, मुक्ति दायिनी शैलपुत्रीप्रणमाभ्यहम्॥

कवच पाठ

ओमकार:मे शिर: पातुमूलाधार निवासिनी।

हींकार,पातुललाटेबीजरूपामहेश्वरी॥

श्रीकार:पातुवदनेलज्जारूपामहेश्वरी।

हूंकार:पातुहृदयेतारिणी शक्ति स्वघृत॥

फट्कार:पातुसर्वागेसर्व सिद्धि फलप्रदा।

नवरात्रि में माँ के प्रथम स्वरुप शैलपुत्री के पूजन से भक्त अपनी इच्छाओ की पूर्ति करने में समर्थ होता है। माता के इस रूप की पूजा से भक्त का मूलाधार चक्र जागृत हो जाता है तथा मूलाधार चक्र जाग्रत होने से इच्छाशक्ति दृढ़ होता है और पुनः इच्छाशक्ति दृढ़ होने से  सफलता गगन चूमने लगती है। अतः हमें माता के इस रूप की पूजा अवश्य करनी चाहिए।

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