Nirjala Ekadashi Fasting Vrat | निर्जला एकादशी व्रत महत्त्व और कथा

Nirjala Ekadashi Fasting Vrat | निर्जला एकादशी व्रत महत्त्व और कथा Nirjala Ekadashi Fasting Vrat | निर्जला एकादशी व्रत महत्त्व और कथा  हिन्दू धर्म में निर्जला एकादशी का बहुत अधिक महत्व है। निर्जला नाम से ही स्पष्ट है यह व्रत बिना पानी पीये तथा अन्न ग्रहण किये हुए किया जाता है। इसी कारण इस व्रत को निर्जला एकादशी व्रत कहा जाता है। निर्जला एकादशी व्रत को करते समय श्रद्धालु लोग भोजन ही नहीं बल्कि पानी भी ग्रहण नहीं करते हैं। उपवास के कठोर नियमों के कारण सभी एकादशी व्रतों में निर्जला एकादशी व्रत सबसे कठिन तथा उपयोगी होता है।,जो भक्त साल की सभी चौबीस एकादशियों का उपवास करने में समर्थ नहीं होता है उन्हें केवल निर्जला एकादशी उपवास करना चाहिए क्योंकि निर्जला एकादशी उपवास करने से दूसरी सभी एकादशियों का लाभ अपने आप मिल जाता हैं।

इस एकादशी को पाण्डव एकादशी, भीमसेनी या भीम एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। पाण्डवों में दूसरा भाई भीमसेन खाने-पीने का अत्यधिक शौक़ीन था और अपनी भूख को नियन्त्रित करने में समर्थ भी नहीं था इसी कारण वह एकादशी व्रत को नही कर पाता था। भीम को छोड़कर सभी पाण्डव भाई और द्रौपदी साल की सभी एकादशी व्रतों को पूरी श्रद्धा भक्ति से किया करते थे।

भीमसेन अपनी इस लाचारी और कमजोरी को लेकर परेशान था। भीमसेन को लगता था कि वह एकादशी व्रत न करके भगवान विष्णु का अनादर कर रहा है। इस परेशानी से बचने के लिए भीमसेन महर्षि व्यास के पास गए तब महर्षि व्यास ने भीमसेन को वर्ष में एक बार निर्जला एकादशी व्रत करने कि सलाह दी ।

महर्षि वेदव्यास ने यह कहा कि निर्जला एकादशी व्रत साल की चौबीस एकादशियों के समान है केवल इस व्रत मात्र को करने से सभी एकादशी व्रत का फल मिल जाता है । भीमसेन ने श्रद्धापूर्वक इस व्रत को किया और मनोवांछित फल प्राप्त किया इसी कारण यह व्रत निर्जला एकादशी के साथ साथ “भीमसेनी एकादशी” और “पाण्डव एकादशी” के नाम से भी जाना जाता है।

निर्जला एकादशी कब होता है।

ज्येष्ठ माह में शुक्ल पक्ष के एकादशी को निर्जला एकादशी का व्रत किया जाता है। अंग्रेजी कैलेण्डर के अनुसार निर्जला एकादशी का व्रत मई अथवा जून के महीने में होता है। सामान्यतः यह व्रत गँगा दशहरा के अगले दिन पड़ता है परन्तु कभी कभी साल में गँगा दशहरा और निर्जला एकादशी दोनों एक ही दिन भी पड़ जाता हैं।

एकादशी का पारण कब करें ?

एकादशी के व्रत को समाप्त करने के बाद जब व्रती कुछ खाकर अपना व्रत तोड़ता है उसे ही पारण कहते हैं। एकादशी व्रत के दूसरे दिन सूर्योदय के बाद पारण किया जाता है। एकादशी व्रत का पारण द्वादशी तिथि के समाप्त होने से पहले निश्चित ही कर लेना चाहिए । यदि द्वादशी तिथि सूर्योदय से पहले समाप्त हो गयी हो तो एकादशी व्रत का पारण सूर्योदय के बाद ही होता है। द्वादशी तिथि के भीतर पारण न करना पाप करने के समान होता है।

एकादशी व्रत का पारण कभी भी “हरि वासर” के दौरान नहीं करना चाहिए। जो व्रती व्रत कर रहे हैं उन्हें व्रत तोड़ने से पहले “हरि वासर” समाप्त होने का इन्तजार करना चाहिए। क्योंकि द्वादशी तिथि की पहली एक चौथाई अवधि “हरि वासर” होता है।

व्रत तोड़ने के लिए सबसे बढ़िया समय प्रातःकाल होता है। व्रत करने वाले भक्तगण को मध्याह्न के दौरान व्रत नहीं तोड़ना चाहिए यदि किसी कारण से कोई प्रातःकाल पारण नही कर पाता है तब उसे मध्यान के बाद ही पारण करना चाहिए।

दूजी एकादशी व्रत होने पर क्या करें ?

तिथि का होने से एकादशी व्रत कभी कभी लगातार दो दिनों के लिए हो जाता है। जब एकादशी व्रत दो दिन का होता है तब स्मार्त-परिवारजनों को पहले दिन एकादशी व्रत करना चाहिए। दुसरे दिन वाली एकादशी को दूजी एकादशी कहते हैं। सन्यासियों, विधवाओं और मोक्ष प्राप्ति के इच्छुक श्रद्धालुओं को दूजी एकादशी के दिन व्रत करना चाहिए। जब-जब एकादशी व्रत दो दिन होता है तब-तब दूजी एकादशी और वैष्णव एकादशी एक ही दिन होती हैं।.

निर्जला एकादशी व्रत कथा

महाभारत काल में एकदा पाण्डु पुत्र भीमसेन ने श्री वेदव्यास जी से पूछा,” हे पितामह ! मेरे परिवार के सभी लोग एकादशी व्रत करते हैं व मुझे भी करने के लिए कहते हैं। किन्तु मुझसे भूखा नहीं रहा जाता। आप कृपा करके मुझे बताएं कि उपवास किए बिना एकादशी का फल कैसे मिल सकता है?”

श्री वेदव्यासजी बोले – हे पुत्र भीम ! यदि आपको स्वर्ग प्रिय लगता है और वहां जाने की इच्छा है तो हर महीने की दोनों एकादशी को व्रत करना ही होगा।”

भीमसेन बोले – पितामह यह हमसे नहीं हो पाएगा

श्री वेदव्यास जी बोले,- हे भीम ! तुम निर्जला एकादशी व्रत करो जो ज्येष्ठ महीने के शुल्क पक्ष को होता है। यह ऐसा व्रत है जिसे करने से सभी एकादशी व्रत करने का फल प्राप्त हो जाता है। परन्तु इस व्रत में अन्न तो क्या, पानी भी नहीं पीना होता है । एकादशी के अगले दिन प्रातः काल स्नान करके, स्वर्ण व जल दान करना चाहिए । इसके बाद पारण के समय (व्रत खोलने का समय) ब्राह्मणों व परिवार के साथ अन्नादि ग्रहण करके अपने व्रत को समाप्त करना चाहिए।

जो श्रद्धालु एकादशी तिथि के सूर्योदय से द्वादशी तिथि के सूर्योदय तक बिना पानी पीए रहता है तथा पूरी विधि से निर्जला व्रत का पालन करता है, उसे साल में जितनी एकादशियां आती हैंं उन सब एकादशियों का फल इस एक एकादशी का व्रत करने से सहज ही मिल जाता है।” यह सुनकर भीम सेन उस दिन से इस निर्जला एकादशी के व्रत का पालन करने लगे अौर वे मनोवांछित फल प्राप्त करते हुए पाप मुक्त हो गए।

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About Dr. Deepak Sharma
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