Yoga for No Children in Astrology | निःसंतान योग का कारण

Yoga for No Children in Astrology | निःसंतान योग का कारण ज्योतिष विज्ञान आपके जीवन में आने वाली समस्याओं के कारण को आपके  जन्मकुंडली में ग्रहो की उच्च, नीच, शत्रु, मित्र राशि में स्थिति को देखकर निदान करता है। भारतीय हिन्दू धर्म में तीन ऋण गुरु ऋण, मातृ ऋण तथा पितृ ऋण को महत्त्वपूर्ण माना गया है  पितृ ऋण से व्यक्ति तब तक उऋण नहीं हो सकता  जब तक पुत्र रत्न की प्राप्ति न जो जाए।  स्त्री मातृ ऋण से उऋण जब ही होती है जब वह मातृत्व शक्ति प्राप्त करती है। ऐसा पौराणिक विचार समाज में प्रतिष्ठित है पुत्र की प्राप्ति से हम अपने कुलवंश को आगे बढ़ाते है अतः पुत्र का महत्त्व कही और ज्यादा बढ़ जाता है। कहा गया है —

 

अपुत्रस्य गति नास्ति शास्त्रेषु श्रुयते मुने  (पाराशर होराशास्त्र )

अर्थात् पुत्रहीन व्यक्ति को सद्गति नहीं मिलती।

वर्तमान परिप्रक्ष्य में —-

असंतानस्य गति नास्ति शास्त्रेषु श्रूयते मुने

अर्थात् बिना संतान ( पुत्र वा पुत्री ) व्यक्ति को सद्गति नहीं मिलती।

हालांकि आधुनिक काल में पुत्र और पुत्री में विभेद नहीं किया जा रहा है तथा पढ़े-लिखे नौजवानो के द्वारा  इस प्रकार के विभेद को अस्वीकार किया जा रहा है यह अच्छी बात है ऐसे विचारो का हमें भरपूर सहयोग देना चाहिए ।

व्यक्ति का जन्म, माता पिता के द्वारा उसका पालन-पोषण, पुनः पढाई-लिखाई, नौकरी ( Service)  तत्पश्चात विवाह ( Marriage ) और संतान प्राप्ति का एक चक्र चलता है इस चक्र में किसी भी कड़ी का न होना जातक को व्यथित करता है। कहा जाता है की जिस व्यक्ति का विवाह नहीं होता है उसका जीवन अधूरा होता है उसी प्रकार संतान के बिना भी परिवार को अधूरा ही माना जाता है। घर में बच्चों के होने से सम्पूर्ण घर जीवित हो उठता है यदि बेटी का जन्म होता है तो हम यह कहते है कि घर में लक्ष्मी का आगमन हुआ है इत्यादि इत्यादि।

अपने ज्योतिषीय जीवन यात्रा में जो मैंने अनुभव किया है कि आज प्रत्येक जातक उत्तम संतान की इच्छा रखता है क्योकि अक्सर मुझसे यह प्रश्न किया जाता है —

  1. क्या मेरी कुंडली में संतान योग है ?
  2. यदि संतान योग है तो पुत्र है या पुत्री या दोनों ?
  3. क्या मेरे बच्चे मेरा ख्याल रखेंगे ?
  4. क्या मेरे बच्चे मुझसे प्रेम करते है ?
  5. क्या मेरे बच्चे की शिक्षा अच्छी होगी ?    
  6. क्या संतान सुख का कोई निदान है ?

जन्मकुंडली में कौन सा भाव संतान भाव है | Which House is Children House

किसी भी जन्मकुंडली में पंचम भाव ( Fifth House ) संतान ( Progeny ) का भाव होता है। पंचम भाव में स्थित ग्रह, पंचम भाव का स्वामी ग्रह तथा उस भाव को देखने वाला ग्रह यह सब आपके संतान के सम्बन्ध में विशेष जानकारी देते है।

जन्मकुंडली में कौन ग्रह है संतान कारक | Significator Planet

किसी भी जन्मकुंडली में ” वृहस्पति / गुरु / Jupiter” ग्रह संतान ( Progeny Child ) का कारक ग्रह होता है। कुंडली में बृहस्पति ग्रह की स्थिति अर्थात उच्च, नीच, केंद्र अथवा त्रिकोण के आधार पर आकलन किया जाता है की आपके बच्चे कितने होनहार है, होंगे या आपका संतान सुख कैसा है वा होगा। संतान सुख मिलेगा या नहीं।

क्या है ? निःसंतान योग का कारण | Yoga for No Children

फलदीपिका जो ज्योतिष शास्त्र की एक मानक पुस्तक है उसमे संतान के सम्बन्ध में कहा गया है —-

लग्नामरेsयशशिनां सुतभेषु पापैर्युक्तेक्षितेष्वथ शुभैरयुतेक्षितेषु।

पापोभयेशू सुतभेषु शूतेश्वरेषु दुस्थानगेषु न भवन्ति सुताः कथंचित।  ( फलदीपिका )

Yoga for No Children in Astrology निःसंतान योग का कारण

1 . यदि लग्न, चन्द्रमा और वृहस्पति ( Jupier) से पंचम स्थान पाप ग्रहो से युक्त हो या दृष्ट हो और उन स्थानों में कोई भी शुभ ग्रह न बैठे हो तथा नहीं उनको शुभ ग्रह देखते हो तो वैसी स्थिति में जातक / व्यक्ति संतान सुख से वंचित रहता है।

2 . यदि लग्न, चन्द्रमा और वृहस्पति से पाचवे भाव का स्वामी दुःस्थान (6, 8, 12 भाव ) में हो या दुःस्थान का स्वामी का सम्बन्ध पंचम भाव या भावेश से हो रहा हो तो भी संतान सुख का अभाव होता है।

3. यदि लग्न, चन्द्रमा ( Moon)  और वृहस्पति से पंचम भाव पाप ग्रहो के बीच में पड़े हो तो संतान सुख नहीं मिलता है यदि संतान होता भी है तो सुख में कमी होगी।

4. पंचम भाव में अल्प संतान राशि ( वृष, सिंह, कन्या ,वृश्चिक ) हो तथा इस राशि पर अशुभ ग्रह की दृष्टि या युति हो और उपर्युक्त योगों में से कोई योग भी घटित होता हो तो देर से संतान होती है या नहीं भी होती है |

5. सप्तमांश लग्न का स्वामी जन्म कुंडली में 6,8 12 वें भाव में  अस्त ,शत्रु –नीच राशि नवांश में स्थित हों तो संतान प्राप्ति में बाधा होती है |

पापे स्वर्क्षगते सुते तनयभाक तस्मिन् सपापे पुनः

पुत्राः स्युर्बहुलाः शुभस्वभवने सोग्रे सुते पुत्रहा।

संज्ञां च अल्पसुतैरक्षमित्यलिवृषस्त्रीसिंहभानां विदुः

तद्राशौ सतभावगेsल्पसुतवान कालांतरेsसाविति ।

6. अर्थात यदि कोई पाप ग्रह पंचम स्थान  का स्वामी होकर उसी स्थान में हो तो पुत्र होगा लेकिन यदि कोई शुभ ग्रह स्वराशि का स्वामी होकर पंचम में हो और साथ ही पंचम में पाप ग्रह हो तो संतान नष्ट करेगा। इसका मतलब यह है की यदि पाप ग्रह अपने ही राशि का होकर बैठा है तो अपने स्थान को नही बिगाड़ता किन्तु यदि दूसरे के घर में बैठा हो तो जिस घर में बैठता है उसको खराब करता है।

7. यदि पंचम भाव, भावेश तथा कारक पर शनि देव की दृष्टि है तो संतान विलम्ब से होता है या मृत संतान का जन्म होता है।

8. यदि पंचम भाव पर मंगल तथा शनि ( Saturn) दोनों की दृष्टि हो तो गर्भ का बच्चा नष्ट होता है।

9. दशम भाव मे बृहस्पति, शुक्र, चन्द्र हो तथा पंचम भाव में राहु, शनि तथा सूर्य तो संतान सुख में देरी होती है।

10. चंद्र कर्क राशि में पाप युत या पाप दृष्ट हो तथा सूर्य पर शनि की दृष्टि हो तो अधिक आयु में संतान की प्राप्ति होती है या नहीं भी होती है।

11. लग्न एवम चंद्रमा से पंचम भाव में निर्बल पाप ग्रह अस्त ,शत्रु –नीच राशि नवांश में स्थित हों ।

12. पंचम भाव पाप कर्तरी योग से पीड़ित हो ।

13. पंचमेश और अस्त गुरु,शत्रु –नीच राशि तथा नवांश में लग्न से 6,8, 12 वें भाव में स्थित हों तो संतान सुख का अभाव होता है।

14. गुरु के अष्टक वर्ग में गुरु से पंचम स्थान में यदि शुभ बिंदु नहीं है तो भी निःसंतान योग होता है।

15. सप्तमेश निर्बल हो कर पंचम भाव में हो तथा शुभ ग्रह की युति वा दृष्टि हो तो संतान प्राप्ति में बाधा होती है |

16. गुरु ,लग्न व चन्द्र से पांचवें स्थान पर पाप ग्रह हों तो निःसंतान होती है |

17. पुत्रेश पाप ग्रहों के मध्य हो तथा पुत्र स्थान पर पाप ग्रह हो ,शुभ ग्रह की दृष्टि न हो तो अन्पतत्यता होती है |

18. गुरु ,लग्नेश ,पंचमेश ,सप्तमेश चारों ही बलहीन हों तो अन्पतत्यता नामक योग का निर्माण होता है जो संतान बाधक होता है |

भौम: पंचमभवने जातं जातं विनाशयति पुत्रं

दृष्टेरुणा प्रथमं सितेन न च सर्वसंदृष्टः।  जातकमाला

19. अर्थात पंचम भाव में यदि मंगल ( Mars )  हो तो जो पुत्र होते है वह नष्ट हो जाते है किन्तु बृहस्पति यदि देखता हो तो केवल ज्येष्ठ पुत्र का नाश होता है। यहाँ इस बात को भी समझना चाहिए की यह जरुरी नही है की जन्म लिया ही पुत्र नष्ट हो यदि मंगल पंचम भाव में है तो गर्भस्थ शिशु नष्ट हो जाता है या भविष्य में आपको पत्र सुख में कमी होगी।

सौ बात की एक बात

Date of  Birth – 26/6/1988 Time of  Birth – 06:28 Place of  Birth – Delhi.

यदि लग्न, चंद्र लग्न तथा गुरु लग्न ( तीनो लग्न से एक साथ ) से पंचम भाव, भावेश तथा संतान कारक बृहस्पति किसी भी तरह से क्रूर ग्रह, नीच राशि, दुःस्थान वा इस स्थान का स्वामी इत्यादि से पीड़ित होता है तो संतानहीनता का योग होगा । यदि नवांश तथा सप्तमांश में भी उपर्युक्त स्थति बनती है तो संतान सुख का अभाव होगा।

लग्न से पंचम भाव भावेश तथा कारक

ऊपर दृष्ट कुंडली में लग्न से पंचम भाव तथा भावेश सूर्य पर नवम भाव से अशुभ ग्रह शनि की दृष्टि है वही पंचम भाव राहु केतु से प्रभावित है, यही नहीं ग्यारहवे भाव से पंचम भाव पर मंगल की दृष्टि भी है तथा संतान कारक ग्रह बृहस्पति को मंगल अपनी चौथी दृष्टि से देख रहा है अतः स्पष्ट है की लग्न से पंचम भाव, भावेश तथा संतान कारक ग्रह गुरु अशुभ ग्रह से प्रभावित है।

चंद्र लग्न से पंचम भाव

चंद्र लग्न से लग्नेश शुक्र पर शनि वक्री होकर देख रहा है तथा चौथी दृष्टि से मंगल भी लग्नेश शुक्र और संतान कारक ग्रह बृहस्पति को देख रहा है। चंद्र लग्न से पंचम भाव में अशुभ मंगल तथा राहु बैठकर निःसंतान योग बना रहा है। यही नहीं शनि भी चंद्र लग्न के पंचम भाव को देखा रहा है। इस प्रकार स्पष्ट है की भाव भावेश तथा कारक ग्रह अशुभ ग्रह से प्रभावित है।

संतान कारक बृहस्पति से पंचम भाव

संतान कारक बृहस्पति को लग्न मानकर देखे तो पंचम भाव करना राशि का स्वामी बुध पर वक्री होकर शनि तथा मंगल की दृष्टि है। पंचम भाव पर पर अशुभ ग्रह मंगल की अष्टम दृष्टि है। संतान कारक बृहस्पति पर मंगल तथा वक्री शनि की दृष्टि है अतः स्पष्ट है की भाव भावेश तथा कारक ग्रह अशुभ ग्रह से प्रभावित है।

नोट :- उपर्युक्त जातक का कोई संतान नहीं है।

 

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