Shattila Ekadashi Vrat – षट्तिला एकादशी व्रत

Shattila Ekadashi Vrat – षट्तिला एकादशी व्रत 31 जनवरी 2019 वृहस्पतिवार के दिन है। षट्तिला एकादशी व्रत प्रतिवर्ष माघ महीना की कृष्ण पक्ष की एकादशी को रखा जाता है। इस दिन तिल दान का बड़ा ही महत्त्व है तिल का उपयोग छ: प्रकार से किया जाता है. जैसे –

  1. तिल से स्नान करना।
  2. तिल का उबटन लगाना।
  3. तिल से हवन करना।
  4. तिल से तर्पण करना।
  5. तिल का भोजन करना।
  6. तिलों का दान करना।

ये छ: प्रकार के उपयोग हैं।  इसी कारण इसका नाम षट्तिला एकादशी व्रत रखा गया है।

षट्तिला एकादशी व्रत महत्व | Importance of Shatatila Ekadashi Vrat

कहा जाता है कि जो भी व्यक्ति पूरी श्रद्धा और विश्वास भाव से षट्तिला एकादशी का व्रत रखता है उसके सभी पाप शीघ्र ही नष्ट हो जाते हैं। एकादशी व्रत के दिन झूठ कभी भी नहीं बोलना चाहिए। यही नहीं  माघ महीना में पूरे माह व्यक्ति को अपनी एकादश इन्द्रियों पर काबू रखना चाहिए। काम, क्रोध, लोभ, मोह, आलस्य, अहंकार, निंदा इत्यादि का त्याग कर भगवान की शरण में जाकर ही माघ मास की कृष्ण पक्ष की एकादशी को व्रत रखना चाहिए ऐसा करने से व्यक्ति के समस्त पाप नष्ट हो जाते है और उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है।

Shattila Ekadashi Vrat - षट्तिला एकादशी व्रत

षट्तिला एकादशी व्रत की कथा |Shattila Ekadashi Vrat katha

एकबार घूमते हुए नारद मुनि भगवान विष्णु के घर पहुंचे और श्री हरि से षट्तिला एकादशी (Shattila Ekadashi Vrat) व्रत की कथा जानने की जिज्ञासा व्यक्त किये तब श्री हरि ने इस व्रत की कथा के सम्बन्ध में कहा  —

देवर्षि द्वारा विनित भाव से षट्तिला एकादशी व्रत (Shattila Ekadashi Vrat)  की कथा जानने की इच्छा व्यक्त करने पर भगवान विष्णु ने कहा प्राचीन काल में पृथ्वी पर एक ब्राह्मणी रहती थी। ब्राह्मणी मुझमें बहुत ही श्रद्धा एवं भक्ति रखती थी तथा मेरे  लिए  सभी व्रत रखती थी। एक बार उसने एक महीने तक व्रत रखकर मेरी आराधना की। उस व्रत के प्रभाव से स्त्री का शरीर तो शुद्ध हो गया परंतु यह स्त्री कभी ब्राह्मण एवं देवताओं के लिए अन्न दान नहीं करती थी अत: मैंने सोचा कि यह स्त्री विष्णु लोक में रहकर भी अतृप्त ही रहेगी अत: मैं स्वयं एक दिन भिक्षा लेने पहुंच गया। ब्राह्मणी से जब मैंने भिक्षा माँगा तब उसने एक मिट्टी का पिण्ड उठाकर मेरे हाथों पर रख दी। मैं  उस  पिण्ड को लेकर अपने धाम लौट आया। कुछ दिनों के बाद वह ब्राह्मणी भी  अपना शरीर त्याग कर विष्णु लोक में आ गयी। मिट्टी का ढेला दान करने से उस ब्राह्मणी को स्वर्ग में सुंदर महल तो मिल गया परन्तु उसने कभी अन्न का दान नहीं किया था इसलिए महल में अन्न आदि से बनी कोई सामग्री नहीं थी। वह घबराकर विष्णु जी के पास गई और कहने लगी कि हे भगवन मैंने आपके लिए व्रत आदि रखकर आपकी बहुत पूजा की उसके बावजूद भी मेरे घर में अन्नादि वस्तुओं का अभाव है।  ऐसा क्यों है? तब विष्णु जी बोले —

तुमसे पहले अपने घर जाओ। तुमसे मिलने के लिए देवस्त्रियाँ आएँगी, तुम अपना द्वार खोलने से पहले उनसे षट्तिला एकादशी की विधि और उसके महात्म्य के बारे में सुनना तब द्वार खोलना। ब्राह्मणी ने वैसा ही किया और द्वार खोलने से पहले षट्तिला एकादशी व्रत के महत्त्व के सम्बन्ध में पूछा। एक देवस्त्री ने ब्राह्मणी की बात सुनकर उसे षट्तिला एकादशी व्रत के महत्त्व के बारे में बताई उसके बाद ब्राह्मणी ने द्वार खोल दिए।  देवस्त्रियों ने देखा कि वह ब्राह्मणी न तो गांधर्वी है और ना ही आसुरी है। वह पहले जैसे मनुष्य रुप में ही थी। अब उस ब्राह्मणी को दान नहीं देने के परिणाम का पता चला।  इसके बाद ब्राह्मणी ने देवस्त्री के कथनानुसार  विधिपूर्वक षट्तिला एकादशी का व्रत (Shattila Ekadashi Vrat) किया। व्रत के प्रभाव से उसका घर अन्न आदि सभी प्रकार की वस्तुओं से भर गया।  इसलिए हे नारद इस बात को सत्य मानों कि जो व्यक्ति इस एकादशी का व्रत करता है और तिल एवं अन्न दान करता है उसे मुक्ति,वैभव तथा वैकुण्ठ धाम की प्राप्ति होती है।

षट्तिला एकादशी व्रत विधि (Shattila Ekadashi Vrat Method)

एक बार की बात है कि दालभ्य ऋषि ने पुलस्त्य ऋषि से पूछा कि पृथ्वी लोक पर मनुष्य अनेक प्रकार के गलत कार्यो में फंसा रहता है।  दुसरो की निंदा बुराई करता है, ब्राह्मण हत्या जैसा अपराध, चोरी तथा अन्य बहुत से पाप कर्म करता है फिर भी उसे मुक्ति की (स्वर्ग लोक) की प्राप्ति होती है।  मै यह नहीं समझ पाया हू कि ये मनुष्य कौन सा दान अथवा पुण्य कर्म करते हैं जिससे इनके सभी पापों का नाश होता है और मोक्ष भी मिल जाता है। पुलस्त्य ऋषि ने कहा कि हे मुनि आज मैं आपको वह रहस्य बताता हूँ।

माघ का महीना बड़ा ही पवित्र और पावन होता है इस महीने में व्रत और तप का अपना ही महत्व है. कृष्ण पक्ष में आने वाली एकादशी को षट्तिला एकादशी (Magha Krishna Paksha Shattila Ekadashi Vrat)) कहा जाता है। पुलस्त्य ऋषि ने कहा कि माघ मास के आरम्भ होते ही मनुष्य को नित्य क्रिया से निवृत्त होकर, प्रातः काल स्नान आदि से शुद्ध होकर अपनी समस्त इन्द्रियों को अपने वश में करके विष्णु भगवान का स्मरण करना चाहिए। उसके बाद पुष्य नक्षत्र में तिल तथा कपास को गोबर में मिलाकर उसके 108 कण्डे बनाकर रख लेना चाहिए। माघ मास की षट्तिला एकादशी को सुबह स्नान आदि करके नया या धुले  वस्त्र धारण करना चाहिए। चुकि यह व्रत भगवान विष्णु के लिए रखा जाता है इसलिए विष्णु जी का ध्यान कर व्रत करने का संकल्प लेना चाहिए। व्रत करने वालों को पुष्प, धूप, गंध,  दीप, ताम्बूल सहित भगवान विष्णु की विधिवत षोड्षोपचार से पूजन करना चाहिए। पुनः रात में तिल कपास से बने हुए गोबर के 108 कंडों से हवन करना चाहिए। रात भर जागकर भगवान का भजन कीर्तन करना चाहिए। दूसरे दिन दिन धूप-दीप और नैवेद्य से विष्णु भगवान का भजन-पूजन करना चाहिए। इसके बाद खिचडी़ का भोग लगाना चाहिए।

इसके बाद मनुष्य को ब्राह्मण पूजा तथा भोग करानी चाहिए। ब्राह्मण को जल से भरा घडा़, छाता, जूते तथा वस्त्र  दान देने चाहिए। अपनी सामर्थ्य के अनुसार तिल का दान करना चाहिए।  काला तिल दान करने से शनि के प्रकोप से भी छुटकारा मिल जाता है।  इसके अलावा यदि आपके पास  सामर्थ्य है तब वह काली गाय का दान करना भी कल्याणप्रद होता है। जो भी व्यक्ति इस षटतिला एकादशी व्रत (Shattila Ekadashi Vrat) करता है तथा अन्न का दान करता है उसे मुक्ति की प्राप्ति होती है।

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About Dr. Deepak Sharma
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